Jamshedpur History: दिसंबर 1939 की यादें‚ आज़ादी का बिगुल गांव से

Jamshedpur History: जमशेदपुर से सटे पोटका प्रखंड के कलिकापुर गांव में आज भी आज़ादी के आंदोलन से जुड़ी वे ऐतिहासिक यादें जीवित हैं, जिनका सीधा संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस से है। आज से करीब 87 वर्ष पूर्व, 5 दिसंबर 1939 को नेताजी ने इस छोटे से गांव का दौरा

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Jamshedpur History: जमशेदपुर से सटे पोटका प्रखंड के कलिकापुर गांव में आज भी आज़ादी के आंदोलन से जुड़ी वे ऐतिहासिक यादें जीवित हैं, जिनका सीधा संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस से है। आज से करीब 87 वर्ष पूर्व, 5 दिसंबर 1939 को नेताजी ने इस छोटे से गांव का दौरा किया था और यहीं से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने वाला संदेश दिया था। यह वही भूमि है, जहां से धालभूम इलाके में आज़ादी की अलख तेज़ हुई।

बताया जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांव में आयोजित ऐतिहासिक बैठक के दौरान अपने ओजस्वी भाषण में कहा था कि आज़ादी भीख में नहीं मिलती, बल्कि इसे संघर्ष के बल पर हासिल करना पड़ता है। उन्होंने ग्रामीणों से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए संगठित होने का आह्वान किया। इस महत्वपूर्ण बैठक की अगुवाई तत्कालीन कांग्रेस नेता करमचंद भगत ने की थी, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए थे।

नेताजी का स्पष्ट उद्देश्य था कि धालभूम क्षेत्र के गांव-गांव तक स्वतंत्रता संग्राम की भावना को पहुंचाया जाए। कलिकापुर गांव में उनका यह दौरा केवल एक सभा नहीं था, बल्कि यह आने वाले आंदोलनों की नींव साबित हुआ। नेताजी के शब्दों ने ग्रामीणों के भीतर देशभक्ति और संघर्ष का जज़्बा भर दिया।

आज भी कलिकापुर गांव के भगत परिवार के घर में उस ऐतिहासिक बैठक से जुड़ी कई निशानियां सुरक्षित रखी गई हैं। इनमें वह कुर्सी, टेबल और टेबल क्लॉथ शामिल हैं, जिनका उपयोग नेताजी ने सभा के दौरान किया था। इसके अलावा गांव की ओर से नेताजी को दिया गया बांग्ला भाषा में लिखा प्रशस्ति पत्र भी सहेजकर रखा गया है, जिसमें आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने का संकल्प दर्ज है।

परिवार के परपोते अभिजीत कुमार भगत ने बताया कि नेताजी के भाषण के बाद पूरे गांव में देशभक्ति की लहर दौड़ गई थी और लोग आज़ादी के संघर्ष के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गए थे।

भगत परिवार की बहुएं और नई पीढ़ी आज भी इस ऐतिहासिक विरासत को पूरी श्रद्धा के साथ संभाल रही हैं। घर की बहू बर्षा भगत का कहना है कि नेताजी की कहानी यहां सिर्फ इतिहास की बात नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की प्रेरणा है। हर साल 23 जनवरी को नेताजी की जयंती पर गांव में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां बच्चों और युवाओं को उनके संघर्ष और बलिदान की कहानी सुनाई जाती है।

कलिकापुर गांव की ये स्मृतियां केवल अतीत की कहानियां नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति का जीवंत पाठ हैं। आज भी यहां नेताजी के शब्द लोगों के दिलों में गूंजते हैं— आज़ादी लड़कर ही मिलती है।

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