Chaibasa News: पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा अंतर्गत बेनीसागर क्षेत्र में जंगली हाथी का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा घटना में बेकाबू हाथी ने वन विभाग के एक कर्मचारी सहित तीन लोगों को कुचलकर मार डाला। यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब जिला पहले ही मानव-हाथी संघर्ष की भयावह स्थिति से गुजर रहा है। इन तीन मौतों के साथ ही बीते नौ दिनों में हाथियों के हमले में जान गंवाने वालों की आधिकारिक संख्या 22 तक पहुंच चुकी है, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल है।
बेनीसागर से सामने आई यह घटना किसी एक दुर्घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की गंभीर विफलता को उजागर करती है। जब एक जंगली हाथी पूरे क्षेत्र में लगातार जानलेवा साबित हो रहा हो और उसे नियंत्रित करने की जिम्मेदारी निभाने वाला वन विभाग अपने ही कर्मचारी की जान न बचा पाए, तो यह साफ संकेत है कि व्यवस्था खतरे के स्तर को पार कर चुकी है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि प्रशिक्षित कर्मी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम ग्रामीणों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा।
हाथियों को आबादी से दूर रखने और उन्हें खदेड़ने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे उलट नजर आती है। वन विभाग की क्विक रिस्पांस टीम होने के दावे के बावजूद, ग्रामीणों का कहना है कि हाथी के गांव में घुसते ही मौके पर मौजूद कर्मियों के पास टॉर्च और पटाखों के अलावा कोई ठोस संसाधन नहीं होता। नौ दिनों में 22 मौतें इस बात का प्रमाण हैं कि मौजूदा रणनीति पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
बेनीसागर की घटना ने वन विभाग की तैयारियों की पोल खोल दी है। जिस विभाग पर जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही विभाग अपने कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, आधुनिक हथियार और प्रभावी प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं करा पा रहा। हाथी के पैरों तले कुचले गए वनकर्मी की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब रक्षक ही लाचार हैं, तो ग्रामीणों से खुद को बचाने की उम्मीद करना कितना जायज है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, हाथी झारखंड-ओडिशा सीमा क्षेत्र में पहले से ही सक्रिय था और रातभर जानलेवा गतिविधियां करता रहा। इसके बावजूद न तो समय रहते गांवों को अलर्ट किया गया और न ही सीमावर्ती राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय दिखा। जबकि हाथियों की लोकेशन ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, प्रशासन की सक्रियता तब नजर आती है जब घटनाएं हो चुकी होती हैं और शव सामने आ जाते हैं।
हर मौत के बाद सरकार मुआवजे की घोषणा कर औपचारिकता निभा देती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या चार लाख रुपये किसी जान की भरपाई कर सकते हैं। कोल्हान क्षेत्र की जनता अब केवल मुआवजा नहीं, बल्कि हाथियों के आतंक से स्थायी राहत चाहती है। हाथी कॉरिडोर की वैज्ञानिक मैपिंग, ट्रेंकुलाइजिंग गन्स की उपलब्धता, सौर बाड़ जैसी योजनाएं और रिहायशी इलाकों को सुरक्षित करने के ठोस उपाय लंबे समय से फाइलों में दबे हैं। यदि इन पर तुरंत अमल नहीं हुआ, तो यह त्रासदी और भी भयावह रूप ले सकती है।


